श्री पार्श्वनाथ स्तोत्र | ‘नरेन्द्रं फणीन्द्रं’

श्री पार्श्वनाथ स्तोत्र (नरेन्द्रं फणीन्द्रं छंद) – संकट निवारक पाठ

परिचय एवं महत्व:
भगवान पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर हैं। ‘नरेन्द्रं फणीन्द्रं’ स्तोत्र संकटों, भयों, व्याधियों एवं विघ्नों को दूर करने वाला अत्यंत प्रभावशाली और भावपूर्ण पाठ है। इसमें भगवान पार्श्वनाथ की अपार करुणा, उपसर्ग-विजय और भक्तों के संकट हरने की महिमा का गुणगान किया गया है।


श्री पार्श्वनाथ स्तोत्र: मूल पाठ

नरेन्द्रं फणीन्द्रं सुरेन्द्रं अधीशं,
शतेन्द्रं सुपूजें भजें नाय शीशं।
मुनीन्द्रं गणेन्द्रं नमों जोडि हाथं,
नमो देव-देवं सदा पार्श्वनाथं ॥ १ ॥

गजेन्द्रं मृगेन्द्रं गह्यो तू छुड़ावै,
महा आग तैं नाग तैं तू बचावै।
महावीर तैं युद्ध में तू जितावै,
महा रोग तैं बंध तैं तू छुड़ावै ॥ २ ॥

दुखी दुःखहर्ता सुखी सुक्खकर्ता,
सदा सेवकों को महानंद भर्ता।
हरै यक्ष राक्षस भूतं पिशाचं,
विषं डाकिनी विघ्न के भय अवाचं ॥ ३ ॥

दरिद्रिन को द्रव्य के दान दीने,
अपुत्रीन को तू भले पुत्र कीने।
महासंकटों से निकारै विधाता,
सबै संपदा सर्व को देहि दाता ॥ ४ ॥

महाचोर को वज्र को भय निवारै,
महापौन के पुंज तैं तू उबारै।
महाक्रोध की अग्नि को मेघ धारा,
महा लोभ-शैलेश को वज्र भारा ॥ ५ ॥

महा मोह अंधेर को ज्ञान भानं,
महा कर्म कांतार को दौ प्रधानं।
किये नाग-नागिन अधोलोक स्वामी,
हरयो मान तू दैत्य को हो अकामी ॥ ६ ॥

तुही कल्पवृक्षं तुही कामधेनं,
तुही दिव्य चिंतामणी नाग-एनं।
पशु नर्क के दुःख तैं तू छुड़ावै,
महा स्वर्ग तैं मुक्ति में तू बसावै ॥ ७ ॥

करै लोह को हेम पाषाण नामी,
रटै नाम सों क्यों न हो मोक्षगामी।
करै सेव ताकी करैं देव सेवा,
सुनै बैन सोई लहै ज्ञान-मेवा ॥ ८ ॥

जपै जाप ताको नहीं पाप लागै,
धरै ध्यान ताके सबै दोष भागै।
बिना तोहि जाने धरे भव घनेरे,
तुम्हारी कृपा तैं सरैं काज मेरे ॥ ९ ॥


श्री पार्श्वनाथ स्तोत्र: सरल हिंदी भावार्थ

छंद १ का अर्थ:
जिन्हें चक्रवर्ती (नरेन्द्र), धरणेन्द्र (फणीन्द्र), और सौधर्मादि देव (सुरेन्द्र व शतेन्द्र) शीश झुकाकर पूजते हैं; बड़े-बड़े मुनीश्वर और गणधर हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं, उन देवाधिदेव भगवान पार्श्वनाथ को मेरा सदा नमस्कार हो।

छंद २ का अर्थ:
हे प्रभु! जब मदमत्त हाथी या सिंह किसी को पकड़ ले, तब आपका स्मरण उसे छुड़ाता है। भीषण आग और विषैले सर्प के भय से आप रक्षा करते हैं। युद्ध के संकट, असाध्य रोगों और कारागार के बंधनों से आप ही मुक्ति दिलाते हैं।

छंद ३ का अर्थ:
आप दुखियों के दुःख हरने वाले, सुखियों को सच्चा सुख देने वाले और अपने सेवकों को महानंद से भरने वाले हैं। आपके नाम-स्मरण से यक्ष, राक्षस, भूत, पिशाच, डाकिनी, विष और अवर्णनीय विघ्नों का भय नष्ट हो जाता है।

छंद ४ का अर्थ:
हे विधाता! आपकी भक्ति से दरिद्रों को धन-संपदा और निःसंतानों को सुपुत्र की प्राप्ति होती है। आप भक्तों को घोर संकटों से उबारते हैं और समस्त संपदाओं के दाता हैं।

छंद ५ का अर्थ:
आप चोरों, बिजली (वज्र) और भीषण आंधी-तूफान (पवन) के भय को दूर करते हैं। क्रोध की ज्वाला को शांत करने के लिए आप मेघधारा के समान हैं और लोभरूपी पर्वत को चूर्ण करने के लिए वज्र के समान हैं।

छंद ६ का अर्थ:
मोह रूपी अंधकार को नष्ट करने के लिए आप ज्ञान रूपी सूर्य हैं और कर्म रूपी घने जंगल को भस्म करने वाले हैं। आपने जलते हुए नाग-नागिन को णमोकार मंत्र सुनाकर अधोलोक (पाताल/भवनवासी) का स्वामी (धरणेन्द्र-पद्मावती) बनाया और कमठ रूपी दैत्य के मान का मर्दन किया।

छंद ७ का अर्थ:
हे नाथ! आप ही कल्पवृक्ष, कामधेनु और चिंतामणि रत्न के समान मनोवांछित फल देने वाले हैं। आप जीवों को तिर्यंच (पशु) और नरक के दुःखों से निकालकर स्वर्ग और मोक्ष का सुख प्रदान करते हैं।

छंद ८ का अर्थ:
जैसे पारस पत्थर लोहे को सोना बना देता है, वैसे ही आपका नाम पाषाण को भी पूज्य बना देता है; फिर आपके नाम का निरंतर जाप करने वाला मोक्षगामी क्यों न होगा! जो आपकी सेवा करता है, देवगण उसकी सेवा करते हैं।

छंद ९ का अर्थ:
जो आपका जाप करता है उसे पाप नहीं लगता, और जो आपका ध्यान धरता है उसके सारे दोष दूर हो जाते हैं। आपको जाने बिना मैंने संसार में अनेक जन्म धारण किए, अब आपकी ही कृपा से मेरे सभी कार्य सिद्ध हों।


स्तोत्र पाठ के लाभ:

  1. संकट एवं बाधा निवारण: आकस्मिक भय, रोग और ग्रह बाधाओं से रक्षा होती है।
  2. आत्मिक शांति: मन में क्षमा, समता और निर्भयता का विकास होता है।
  3. सुख-समृद्धि: निष्काम भक्ति से सांसारिक एवं पारलौकिक कल्याण की प्राप्ति होती है।