श्रावक संस्कार साधना शिविर पंजीयन 2026 अतिशय क्षेत्र पनागर।

परिचय एवं महत्व:
णमोकार महामंत्र (नवकार मंत्र) जैन धर्म का सर्वोपरि, प्राणभूत और अनादि-अनंत महामंत्र है। यह किसी व्यक्ति विशेष को नहीं, बल्कि उन पंच परमेष्ठियों (अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय एवं सर्व साधु) के पावन गुणों को समर्पित है, जिन्होंने आत्म-कल्याण कर मोक्ष मार्ग को प्रशस्त किया है। इस महामंत्र के 35 अक्षरों में संपूर्ण द्वादशांग जिनवाणी का सार समाहित है।


णमोकार महामंत्र: मूल प्राकृत पाठ

णमो अरिहंताणं।
णमो सिद्धाणं।
णमो आइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं।
णमो लोए सव्बसाहूणं॥

एसो पंच णमोक्कारो, सव्वपावप्पणासणो।
मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं॥


पंच परमेष्ठी एवं नौ पदों का सरल हिंदी अर्थ

१. णमो अरिहंताणं:
जिन्होंने चार घातिया कर्मों का नाश कर अनंत चतुष्टय (अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख, अनंत वीर्य) प्राप्त किया है, उन सकल परमात्मा श्री अरिहंत देव को मेरा नमस्कार हो।

२. णमो सिद्धाणं:
जो आठों कर्मों से मुक्त होकर लोक के अग्रभाग (सिद्धशिला) पर विराजमान हैं, उन अशरीरी एवं शुद्ध आत्मस्वरूप श्री सिद्ध भगवान को मेरा नमस्कार हो।

३. णमो आइरियाणं:
जो स्वयं पंचाचार (ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार, वीर्याचार) का पालन करते हैं और चतुर्विध संघ (मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका) का कुशलतापूर्वक संचालन व मार्गदर्शन करते हैं, उन पूज्य आचार्यों को मेरा नमस्कार हो।

४. णमो उवज्झायाणं:
जो स्वयं 11 अंग और 14 पूर्व का स्वाध्याय करते हैं और संघ के साधुओं को जिनवाणी का ज्ञान कराते हैं, उन पूज्य उपाध्यायों को मेरा नमस्कार हो।

५. णमो लोए सव्बसाहूणं:
इस लोक में 28 मूलगुणों का निष्कपट पालन करने वाले और आत्म-साधना में लीन समस्त दिगंबर साधु-संतों को मेरा नमस्कार हो।

फल-श्रुति (चूलिका का अर्थ):

  • एसो पंच णमोक्कारो, सव्वपावप्पणासणो: यह पाँचों परमेष्ठियों को किया गया नमस्कार समस्त पापों का नाश करने वाला है।
  • मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं: यह संसार के सभी मंगलों में सबसे पहला और सर्वश्रेष्ठ मंगल है।

णमोकार मंत्र जाप की विधि:

  1. पवित्रता एवं दिशा: प्रातः अथवा संध्या समय शुद्ध वस्त्र धारण कर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  2. एकाग्रता: पद्मासन या सुखासन लगाकर श्वास की गति के साथ मन को पंच परमेष्ठियों के गुणों में स्थिर करें।
  3. जाप संख्या: १०८ बार णमोकार मंत्र पड़ने पर 1 माला पूर्ण होती है |

महामंत्र के नियमित स्मरण के आध्यात्मिक लाभ:

  1. पाप कर्मों का क्षय: अनादि काल से आत्मा से बंधे अशुभ कर्मों की निर्जरा होती है।
  2. आंतरिक समता: क्रोध, मान, माया, लोभ जैसे कषाय शांत होते हैं और आत्म-शांति मिलती है।
  3. संकट निवारण: जीवन में आने वाले सभी प्रकार के भय, क्लेश और अमंगल का शमन होता है।

पूज्य मुनि श्री १०८ निर्दोष सागर जी महाराज,
पूज्य मुनि श्री १०८ निर्लोभसागर जी महाराज,
पूज्य मुनि श्री १०८ निरुपम सागर जी महाराज

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2 responses to “vidyaguruvaram”

  1. Happy Avatar
    Happy

    जय जिनेंद्र 🙏,
    बहुत सुंदर वेबसाइट है,
    बहुत बहुत आभार

  2. vishal jain Avatar
    vishal jain

    🙏🙏🙏

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